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Thursday, 15 March 2012

हसरत.................

हसरत रहती थी मेरीतेरी एक झलक बस पाने की !
हिम्मत हुई नहीं तुझसे ,कभी अपने मन की कहने की !!
अब तुम जो मुझसे दूर हुए , इल्जाम मैं इसका किसको दूं !
आदत हो गयी अब मुझको, बस यूं ही तनहा रहने की !! 

5 comments:

  1. बहुत सुन्दर सृजन, बधाई.

    कृपया मेरे ब्लॉग " meri kavitayen" पर पधारें, मेरे प्रयास पर अपनी बहुमूल्य प्रतिक्रिया दें .

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  2. बहुत ही बेहतरीन रचना....
    मेरे ब्लॉग

    विचार बोध
    पर आपका हार्दिक स्वागत है।

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  3. किसी से दूरी ऐसा करने को मजबूर कर देती है ... बहुत खूब ...

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आपके सुझाव और प्रतिक्रियाएं सादर आमंत्रित है ! आपकी आलोचना की हमे आवश्यकता है,
आपका अपना
पी के ''तनहा''